Sunday, 13 January 2019

समाजसेवा (Social service)

समाजसेवा (Social service)
Sunday, 13 January 2019

समाजसेवा (Social service)


जिस व्यक्ति में समाजसेवा की भावना नहीं है वह मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं है। समाज व्यक्तियों का उद्देश्यपूर्ण संगठन होता है। व्यक्तियो का समुचित एतं सर्वागीण बिकास समाज में ही संभव है। व्यक्ति की सारी आवश्यकताओं की पूर्ति समाज द्वारा ही होती है। 
समाज की सहायता के अभाव में किसी व्यक्ति का जीवन अत्यंत कठिन हो जाएगा। समाज व्यक्ति के बिकास के लिए इतना करता है, तो व्यक्ति का भी कर्तव्य है कि वह समाज की प्रगति मे अपना योगदान दे। समाज ने मुझे दिया है, मुझे भी समाज को देना है जिस दिन किसी व्यक्ति में यह मात जागृत हो जाए तो सोचना चाहिए उसी दिन से वह व्यक्ति समाजसेवक हो गया।

हमारे जीवन में प्रतिदिन समाजसेवा के छोटे बडे अवसर आते रहते है। हमे इन अवसरों पर अपने सामाजिक दायित्व का निर्वाह करना चाहिए। यदि हम ऐसा नहीं करते हैं तो हम सामाजिक प्राणी कहलाने के अधिकारी नहीं हैं।

हमारा परिवार छोटा समाज है। हमें सामाजिक सेवा का स्वाभाविक प्रशिक्षण यहां मिलता है। हमारी समाजसेवा की शुरुआत अपने परिवार ओंर पडोस के परिवारों से होना चाहिए। और, प्राय: ऐसा होता भी है । 
हमें अपने पडोसी के सुख दुख में सम्मिलित होना चाहिए । हमारे जीवन में पग पग पर समाज सेवा के अवसर आते रहते हैं। इन अवसरों पर बेझिझक हमेँ समाजसेवा के लिए तत्पर होना चाहिए।

ईसा मसीह ने अपने शिष्यों से ’समरीतन की कथा सुनाई थी। रास्ते पर एक घायल पडा था। पुजारी, धर्मात्मा, समाज सुधारक सभी उस रास्ते से गए, पर उन्होने उस घायल को देखते हुए भी उसकी कोई मदद नहीं की। समरीतन ने उसे देखा। वह उस घायल की दशा देखकर करुणा से मर गया। उसने उस घायल की पूरी सेवा की। सच्चे अर्थों में वही पुजारी, धर्मात्मा ओर समाजसुधारक था; और तो होगीं ये। समाजसेवा में ढोग नहीं चलता। समाजसेवा प्रत्येक सामाजिक व्यक्ति का कर्तव्य है। किसी भी देश की सभ्यता और संस्कृति की उच्वता का आधार यही है कि उस देश के नागरिक समाजसेवा सलग्रर रहें।