नशाबंदी (Prohibition)
आज के युग में मद्य सेवन का प्रवेश हो गया है। लेकिन ऐसा नहीं है कि मद्य सेवन की प्रवृत्ति आज की देन ही है। अपितु मद्य सेवन की प्रवृत्ति दो शताब्दियों पूर्व की है। हमारे प्राचीन धर्म ग्रंथों में भी सोम और सुरा शब्दों का उल्लेख हुआ है।
जो इस तथ्य को प्रमाणित करते हैं कि हमारे पूर्वज मादक पदार्थों के प्रेमी , और इसका सेवन खुले रुप में किया करते थे। यह भी सत्य है कि आज की तरह सोमरस पान के लिए बड़े बड़े संकट मंडराते थे। मद्य सेवन का प्रभाव उत्तेजना प्रदान कर बकवास और मुसीबतों को आमंत्रित करता हैं।
मादक मद्य द्रव्य का सेवन निरंतर क्यों बढ़ रहा है?
जबकि इसके परिणाम केवल भयानक ही नहीं अपितु प्राणहारी भी हैं। मादक मद्य सेवन के प्रमुख कारण एक नहीं
अनेक हैं। कुछ तो कारण ऐसे हैं जो यथार्थ और स्वाभाविक लगते हैं जैसे निरंतर दुख अवसादपीड़ा और उलझन के कारण परेशान और लाचार होकर मन की शांति के लिए नशा का सेवन किया जाता है। कुछ ऐसे भी कारण है जो अस्वाभाविक और असंगत लगते , जैसे शौकवश किसी की नकल करके इसकी लत में पड़ जाना।
मद्य सेवन के कारण जो भी हो इससे किसी प्रकार का कल्याण संभव नहीं है। इसके सेवन से गरीबी निराशा, तनाव, बेरोजगारी, हीन भाव, नाकुंठा, अभाव, अवसाद, व्याकुलता, शोक आदि से मुक्ति मिल नहीं सकती है । मादक द्रव्यों या पदार्थों के सेवन करने का एक मुख्य कारण है समाज की विषमता।
समाज में सभी एक समान नहीं है, कहीं अमीरी है तो
कहीं गरीबी, और कहीं साक्षरता है तो कहीं निरक्षरता है। दूसरी और धनी और संपन्न वर्ग निम्न और अभावग्रस्त व्यक्तियों का शोषण करते हैं। वह गरीब और दीनदुखी कर्जदार व्यक्तियों को तनाव और अशांति के घेरे में डालकर मादक द्रव्यों का सेवन करने के लिए विवश कर देते हैं।
मद्य सेवन की दुष्प्रवृत्ति को रोकने के लिए व्यापक स्तर पर सामाजिक जागृति आवश्यक है। यह व्यक्तिगत संपर्क आकाशवाणी दूरदर्शन समाचार पत्रों सहित अनेक प्रकार के इश्तिहारों के द्वारा अधिक सफलता के साथ कार्यान्वित की जा सकती है।
इसके साथ ही साथ काव्य-गोष्ठियों नाटकों कवि-सम्मेलनों सहित जागृति के शिविरों द्वारा भी नशाबंदी की दुष्प्रवृत्ति को रोका जा सकता है।