Wednesday, 9 January 2019

शिक्षा और चरित्र निर्माण (Education and Character Creation)

शिक्षा और चरित्र निर्माण (Education and Character Creation)
Wednesday, 9 January 2019

शिक्षा और चरित्र निर्माण (Education and Character Creation)

शिक्षा का अर्य है दिद्योपार्जना सदृज्ञान और सद्विवेक शिक्षा की देन है। यदि प्रारंभ में छात्रों के क्रियाकलापों पर गौर करें, तो पाएंगे कि प्राथमिक विद्यालय से लेकर उच्च विद्यालयोक और महाविद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों तक में अध्ययन करते हुए जो भी 18 20 वर्ष कम से कम व्यतीत करते हैं, उसका लक्ष्य ज्ञानार्जन मात्र होता है । यह ज्ञानार्जन झाक विषयों एव उनके परिचायक साहित्य का होता है। आशा की जाती हे कि उन का अध्ययन करते हुए वह इस योग्य बन जाएंगे कि अपना जीवन सुखपूर्वक बिता सके।

आज की शिक्षा में चरित्र निर्माण का कोई स्थान नहीँ है, और न उसका कोई महत्व दिया जाता है। हमारी संस्कृति में गुरु और शिष्य का संबंध बहुत ही सुंदर ओंर सुखद हुआ करता था। इसका कारण यही था कि दोनों का एक दूसरे पर बिश्वास हुआ करता था। 

गुरु…शिष्य को पुत्रवत् मानते ये, और उस पर स्नेह रखते ये। शिष्य गुरु को पितातुल्प और विश्वसनीय समझता था। शिष्य के जीवन पर गुरु का गहरा प्रभाव पडता था और गुरु शिष्य के बीच केवल व्यापारिक संबंध, जिसमें पैसे के बदले कुछ पुस्तक पढा देना मात्र का संबंध होता हे, न रहकर आध्यात्मिक संबंध हो जाता था. जो घनिष्ट हुए बिना नहीं रह सकता था। आए दिन समाचार पत्रों में छात्रों और शिक्षकों के संबंध में ऐसी शर्मनाक बातें पढने को मिलती हें। जिससे हृदय अत्यंत खित्र हो उठता है। मेरी समझ में इसका मौलिक कारण चरित्र गठन पर ध्यान देना और छात्रों पर शिक्षक वर्ग के नैतिक प्रभाव का न होना ही है। छात्रों के लिए सही चरित्र निर्माण के लिए न केवल उनके जीवन से जुडी शिक्षा अनिवार्य है. बल्कि शिक्षा काल में हमेशा रचनात्मक कार्यक्रमों में उनका व्यस्त रहना भी अनिवार्य है पर प्राय: देखा यहीं जा रहा है कि किताबी अध्ययन के अतिरिक्त छात्रों को किसी प्रकार का न तो रचनात्मक व्यवस्था है और न उनके बरि में उन्है सम्यक दिशा निर्देश ही मिल पाता है ।

चरित्र के अभाव में किसी देश का सम्यक बिकास नहीं हो सकता । किसी देश के चरित्र का अर्य है उसके नागरिकों का चरित्र और नागरिकों के चरित्र की बुनियादा चरित्रवान नागरिक जब ज्ञानवान होते हैँ. तभी साहित्य विज्ञान आदि क्षेत्रों में भी कुछ काम कर पाते हैँ। कुछ उपलब्धियां प्राप्त कर पाते हैँ, पर ज्ञानवान होना विद्योपार्जन के बिना असंभव है। बिद्योयार्जन तभी संभव है जब उसकी प्राप्ति करने वाले अपने गुरुजनों के अनुशासन में रहे, उनकी सीख सुनें, उनके द्वारा बताए मार्ग पर चले।

इस तरह चरित्र निर्माण के लिए सदशिक्षा आवश्यक है । इसके अभाव में सच्चरित्र की कल्पना करना भी मूर्खता ही होगी। आज जरुरी है अच्छी शिक्षा व्यवस्था की, मधुर छात्र…अध्यापक संबंध कि। हमें इस विशाल राष्ट्र का प्रबुद्ध नागरिक बनना है या अपने आप में हर दृष्टि से महान काम है, ओंर इसका दुर्बल भार चरित्रवान तथा ज्ञानवान नागरिक ही उठा सकता है। साथी चरित्र निर्माण पारिवारिक एवं सामाजिक सतो की कुँजी है ।