Monday, 14 January 2019

दहेज प्रथा (Dowry System)

दहेज प्रथा (Dowry System)
Monday, 14 January 2019

दहेज प्रथा (Dowry System)

हमारे वर्तमान सामाजिक जीवन की सर्वाधिक असाध्य व्याधि है दहेज प्रथा। दहेज मातृ शक्ति की विराटता के समक्ष भयंकर प्रश्न चिंह हे। सदियो से शोषित नारी आज तक वास्तविक मूल्पवत्ता से ववित हे। दहेज उसकी उदात्त अभिव्यक्तियों का उपहासात्मक पुरस्कार है। आदि शक्ति दुर्गा विद्या दातृ सरस्वती और दान दातृ लस्सी को आहत करने वाली यह विषेली प्रथा बहुत बडी चुनौती हे। 

आरंभ में यह प्रथा कन्या पक्ष के प्रेम प्रदर्शन के रूप में प्रकट हुई। आगे यह अपनी वास्तविक चेतना खो बैठी। इसने झूठी सामाजिक प्रतिष्ठा का रुप ले लिया। अधिकाधिक दहेज लेना शान की वात समझी जाने लगी। 

वस्तुत: दहेज प्रथा का विरोध वाणी से नहीं कर्म से हारे और वह भी सामूहिक स्तर पर हो तो निश्चित ही सफलता मिलेगी । दहेज प्रथा के दुष्परिणाम अनगिनत हैँ ।

अल्प वित्तीय परिवार की रूपवती, शीलवती एव गुणवती कन्याएँ भी दहेज के अभाव में गदहों के गले बाँध दी जाती हैं। दहेज रोग वर कन्या के मिलन मार्ग की सबसे बडी बाधा है। कन्याओ का आत्मदाह, अनुचित असामाजिक वृत्तियों का अवलंबन दहेज प्रथा का प्रतिफल है। 

यह प्रथा नारी की अस्मिता के अवमूल्यन की और संकेत करती है। अत: यदि तमाम माताएँ अपने पुत्रों की शादियाँ बिना दहेज लिए करने का संकल्प कर सकेगी तो अवश्य ही समाज को इस कुष्ठ से त्राण मिल सकेगा। सच्चाई तो यह है कि बहुओं को तिलक दहेज के लिए सास और ननद के ही विष भरे ताने सहने पड़ते हैँ ,पति और ससुर की झिड़कियाँ कम सुननी पडती है। हमारे समाज की धमनियों में पूरी तरह दहेज का जहर फैल चुका है ।

अस्तु तमाम नर नारियों के दृढ संकल्प ही इस विषयुक्त परंपरा को नष्ट कर पाएंगे। कन्याओं को आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर एबं मानसिक दृष्टि से सशक्त बनाना होगा, दहेज माँगने वालों को निभंक्रितापूर्वक बहिरुकृत और तिरस्कृत करना पडेगा । 

निष्कर्षत: दहेज प्रथा भारतीय समाज के समुत्रत ललाट पर ऐसा रिसता हुआ घाव है जिसके लिए उत्तरदायी पुरुष और नारी दोनों वर्ग ही हैं ओर समाधान सामूहिक संकल्प से ही संभव हो सकेगा।