Wednesday, 9 January 2019

Deat Poet (प्रिय कवि)

Deat Poet (प्रिय कवि)
Wednesday, 9 January 2019

Deat Poet (प्रिय कवि)

आधुनिक कात के हिंदी कदिर्या ने मैथिलीशरण गुप्त का स्यान अत्यंत महत्वपूर्ण है। ठनका जन्म घिरगांव (जिला झांसी. ठत्तर प्रदेश) ने सन 1883 ई0 ने हुआ था। ठनके पिता का नाम सेठ रामचरण था. जो एक धन-संपन्न वैष्णव ये। 

मैथिलीशरण गुप्त का काव्य प्रतिभा पैतृक संपति अथवा विरासत के रुप ने प्राप्त हुई. 3नके पिता श्री 'वन्नकतता' ठपमाम से कविता किया काने ये। मैथिलीशरण गुप्त को बचपन से ही कविता करने का शोक था। प्रारंभ ने वह ब्रजभाषा मे कविता करने थे, परंतु बाद ने आचार्य महातीर प्रसाद दृबिवेदी के प्रआवबश खडी बोली मै कविता काने तने। ठजकीं सरस कविताओं ने यह स्रिट्य कर दिया कि व्रज आषा के समान खडी बोली ने ओ सरस एवं कर्णप्रिय कविता लिखी जा सक्सी है।

सन 1906 इं0 से गुप्त जी की कविताएं आचार्य महाबीर प्रसाद त्विब्रैदी त्वारा संपादित मासिक पत्रिका 'सरस्वती' ने प्रकाशित होने लगी थी, वे अनेक मान सम्मान प्राप्त करने के ठपरांत आप सम् 1964 ईस्वी ने स्वर्गवासी हुए । 

गुप्त जो की प्रकाशित सौतिक रचनाओं की संख्या लगभग 52 है। इसके अलावा कई अनुवादित ग्रंथ भी है। आप की प्रस्रित्घ काव्य-कुतियां है, आरत भारती. जयद्रथ बध. साकेत, यशोधरा, पंचवटी, दवापर. वैतालिक, अनघ, नहुष. सिटूधराज, दिक्ट अट तथा बिष्णुप्रिया 1 

राष्टीय आतमा और भारतीय संस्कूति के प्रति अविचल निष्ठा आप की कविता की प्रभुख विशेषताएं हैं। अपनी प्रथम रचना 'भारत आरती' टूबारा ब्लॉने देशवासिर्या का ध्यान भारत के अतीत के गांरव एवं वर्तमान की दुर्दशा की और आकृष्ट काके पराधीनता की तेठिर्या से मुवत्त होने की प्रेरणा प्रदान की। उसके बाद 'वैतालिकं के गीतों दवारा अपने एक सच्चे वेतालिक के रुप ने भारतवासियों कीं मोहनिद्रा अंग की और ब्लॉ प्रगति की और ठम्मुख किया। रांस्टीयता दवारा समस्त रचनाओं के आंत३-प्रोत होने के कारण सन 1936 ईस्वी ने राष्ट्रपिता महात्मा आंधी ने गुप्त जो को राष्ट्रकवि की ठपाघि से विभूषित किया । 

गुप्त जी की काव्य प्रतिभा की सबसे बडी विशेषता है-कातानुसार काव्य सृजन कीं क्षमता. अर्थात् उत्तरोत्तर बदलती हुई भावनाओँ और काव्य प्रणालियों को ग्रहण करने चतने की शक्ति। समाज के दलित. शोषित. पतित एवं तिम्मवर्ण की समानता एवं प्रतिष्ठा के लिए गुप्त जो कीं पुकार सर्वोपरि है। नारी की महता और उपेक्षा के प्रति गुप्त जी कीं दृष्टि सदा मार्मिक रहीँ है। इसलिए 'त्वापर मे गुप्त जो ने मारी कीं महता को प्रतिपादित किया है तथा 'यशोधरा मे उसकी दुर्दशा पर आंसूबहाए हैं।